कवि परिचय (About the Poet)
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (Sarveshwar Dayal Saxena)
जन्म: 15 सितंबर 1927, बस्ती, उत्तर प्रदेश
निधन: 23 सितंबर 1983, बस्ती, उत्तर प्रदेश
शिक्षा: काशी और इलाहाबाद में उच्च शिक्षा
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, कहानीकार और नाटककार थे। उन्होंने अध्यापन और सरकारी कार्यालयों में काम किया। आकाशवाणी (All India Radio) में कार्य किया और 'दिनमान' समाचार पत्र में अज्ञेय जी के निमंत्रण पर काम किया। बाल पत्रिका 'पराग' के संपादक भी रहे।
प्रमुख रचनाएँ: 'काठ की घंटियाँ' (1959), 'तीसरा सप्तक' (1959), 'बकरी' (नाटक)
पुरस्कार: साहित्य अकादमी पुरस्कार (1983) - 'खूँटियों पर टंगे लोग' के लिए
सीखने के उद्देश्य (Learning Objectives)
- शाम के प्राकृतिक दृश्य का सुंदर वर्णन समझना
- मानवीकरण अलंकार को समझना
- रूपक और उपमा अलंकार की पहचान करना
- प्रकृति के सौंदर्य का अवलोकन करना सीखना
- काव्य में बिंब योजना को समझना
कविता (Poem)
आकाश का साफ़ा बाँधकर
(Aakash ka saafa baandhkar - Tying the sky as a turban)
सूरज की चिलम खींचता
(Sooraj ki chilam kheenchta - Smoking the sun's pipe)
बैठा है पहाड़,
(Baitha hai pahaad - The mountain sits)
घुटनों पर पड़ी है नदी चादर-सी,
(Ghutnon par padi hai nadi chadar-si - The river lies on its knees like a shawl)
पास ही दहक रही है
(Paas hi dahak rahi hai - Nearby is glowing)
पलाश के जंगल की अँगीठी
(Palaash ke jangal ki angeethi - The brazier of Palash forest)
अंधकार दूर पूर्व में
(Andhkar door poorva mein - Darkness in the far east)
सिमटा बैठा है भेड़ों के गल्ले-सा।
(Simta baitha hai bhedon ke galle-sa - Huddled like a flock of sheep)
पाठ सार (Summary)
यह कविता कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना द्वारा लिखी गई है। कवि ने अपनी कविता 'शाम-एक किसान' में शाम के समय का बड़ा ही मनोहर वर्णन किया है।
शाम का प्राकृतिक दृश्य बहुत ही सुंदर है। इस दौरान पहाड़ एक किसान की तरह बैठा हुआ दिखाई दे रहा है। उसके सिर पर आसमान किसी साफ़े के समान बंधा हुआ प्रतीत हो रहा है।
पहाड़ के नीचे बहती हुई नदी ऐसी लग रही है जैसे पहाड़ ने घुटनों तक किसी चादर को ओड़ा हुआ हो। पलाश के पेड़ों पर खिले लाल-लाल फूल अंगीठी में अंगारों की तरह प्रतीत हो रहे हैं।
दूर पूर्व दिशा में पसरा हुआ अँधेरा ऐसा महसूस हो रहा है जैसे भेड़ों का समूह दुबक के बैठा हो।
शब्दार्थ (Word Meanings)
साफा (Saafa)
पगड़ी - Turban
चिलम (Chilam)
धूम्रपान की नली - Traditional smoking pipe
पलाश (Palaash)
लाल फूलों वाला वृक्ष - Flame of the Forest tree
अंगीठी (Angeethi)
अंगारों से भरी चूल्हा - Brazier with burning coals
गल्ला (Galla)
झुंड (भेड़ों का) - Flock (of sheep)
दहकना (Dahakna)
जलना, चमकना - To glow, to burn
सिमटना (Simtna)
सिकुड़ना, दुबकना - To shrink, to huddle
मनोहर (Manohar)
सुंदर, आकर्षक - Beautiful, enchanting
प्रतीत होना (Prateet hona)
दिखना, लगना - To appear, to seem
दुबकना (Dubakna)
छिपना, सिकुड़कर बैठना - To crouch, to huddle
काव्य सौंदर्य (Literary Beauty)
1. मानवीकरण (Personification)
कवि ने शाम को एक किसान के रूप में चित्रित किया है। पहाड़ को किसान के रूप में दर्शाया गया है।
2. उपमा अलंकार (Simile)
- नदी चादर-सी (River like a shawl)
- भेड़ों के गल्ले-सा (Like a flock of sheep)
3. रूपक अलंकार (Metaphor)
- आकाश का साफा (Sky as turban)
- सूरज की चिलम (Sun as pipe)
- पलाश की अंगीठी (Palash forest as brazier)
4. दृश्य बिंब (Visual Imagery)
कवि ने शीत ऋतु की शाम का मनोहर दृश्य चित्र प्रस्तुत किया है।
मुख्य विचार (Central Ideas)
प्रकृति का सौंदर्य (Nature's Beauty)
कविता प्रकृति के शाम के समय के शांत और सुंदर दृश्य का उत्सव मनाती है।
ग्रामीण जीवन से जुड़ाव (Connection with Rural Life)
प्रकृति की तुलना किसान से करके कवि शहरी पाठकों को ग्रामीण जीवन से जोड़ता है।
सादगी और शांति (Simplicity and Peace)
दिन भर के काम के बाद आराम करते किसान की कल्पना शांति और संतोष को दर्शाती है।